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पशुपतिनाथ मंदिर मंदसौर 2023

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  पशुपतिनाथ मंदिर मंदसौर 2023 मंदसौर का मुख्य आकर्षण भगवान पशुपतिनाथ मंदिर है। पशुपतिनाथ भगवान शिव का पर्यायवाची नाम है। इस कलात्मक मूर्ति का निर्माण चमकते हुए गहरे तांबे के उग्र चट्टान-खंड में हुआ है। मंदिर शिवना नदी के तट पर स्थित है। इसका वजन 4600 किलोग्राम है। वक्रता में ऊँचाई 7.25 फीट और सीधी में 11.25 फीट है। इसके 8 सिर हैं जिन्हें वे दो भागों में विभाजित करते हैं। पहला भाग 4 शीर्ष पर और दूसरा भाग 4 शीर्ष तल में। शीर्ष 4 सिर स्पष्ट, परिष्कृत और पूर्ण हैं तो 4 नीचे के सिर परिष्कृत नहीं हैं। इस मंदिर के चारों दिशाओं में चार दरवाजे हैं लेकिन प्रवेश द्वार पश्चिम में स्थित है। इस पुतले के सिर जो पश्चिम में स्थित हैं, भगवान शिव की भयावह छवि प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सिर के मेकअप में तीन रास्प (नख) दिखाई देते हैं जो जहरीले सांपों के गोले के आकार के बालों में होते हैं, तीसरी आंख और उभरी हुई जेली होती है। केंद्र में उलझे हुए बाल सांपों से घिरे होते हैं जो सर्वनाश करने वाले ओम्कार होते हैं (वेद मंत्र जो ईश्वर के प्रतीक हैं) दरअसल ये मंदिर प्राकृति की गोद में बसा हुआ है. इसलिए यहां भक्तों

सास बहू मंदिर, ग्वालियर -

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  सास बहू मंदिर, ग्वालियर - किलों के शहर ग्वालियर के सास-बहू मंदिर के बारे में जानते हैं आप ? मध्य प्रदेश के उत्तर में स्थित ग्वालियर शहर अपने आप में इतिहास की कई गाथाएं समेटे हुए है और राज्य के पर्यटन मानचित्र पर अपना विशेष स्थान भी रखता है। इतिहास की पुस्तकों में उल्लेख मिलता है कि ग्वालियर गुर्जर-प्रतिहार राजवंश, तोमर तथा बघेलों की राजधानी रहा है। ग्वालियर को गालव ऋषि की तपोभूमि भी कहा जाता है। ग्वालियर को इतिहास और आधुनिकता का अनोखा संगम भी कह सकते हैं। यहां के दर्शनीय स्थलों की बात करें तो सबसे पहले सूर्य मंदिर का नाम आता है। ग्वालियर का सूर्य मंदिर देश के अन्य मंदिरों के लिए एक आदर्श है। यह मंदिर पंडे−पुजारियों और भिखारियों के आतंक से तो मुक्त है ही साथ ही अन्य जगहों की अपेक्षा यहां सफाई पर भी अत्यधिक ध्यान दिया गया है। यह सूर्य मंदिर ओडिशा के कोणार्क मंदिर की शैली पर बना है। लाल पत्थर से निर्मित इस भव्य मंदिर के चारों ओर मनोरम उद्यान भी हैं। मध्य प्रदेश के उत्तर में स्थित ग्वालियर शहर अपने आप में इतिहास की कई गाथाएं समेटे हुए है और राज्य के पर्यटन मानचित्र पर अपना विशेष स

2023 में अगर आप भी जाना चाहते श्री सोमनाथ मंदिर तो जानिए मंदिर का इतिहास महत्व और कथा

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  2023 में अगर आप भी जाना चाहते श्री सोमनाथ मंदिर तो जानिए मंदिर  का इतिहास  महत्व और कथा गुजरात प्रांत के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे सोमनाथ नामक विश्वप्रसिद्ध मंदिर में 12 ज्योतिर्लिंगों से एक स्थापित है। पावन प्रभास क्षेत्र में स्थित इस सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कंद पुराणादि में विस्तार से बताई गई है। चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है। उन्होंने भगवान शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इसका नाम 'सोमनाथ' हो गया कहते हैं कि सोमनाथ के मंदिर में शिवलिंग हवा में स्थित था। यह एक कौतुहल का विषय था। जानकारों के अनुसार यह वास्तुकला का एक नायाब नमूना था। इसका शिवलिंग चुम्बक की शक्ति से हवा में ही स्थि‍त था। कहते हैं कि महमूद गजनबी इसे देखकर हतप्रभ रह गया था। सर्वप्रथम इस मंदिर के उल्लेखानुसार ईसा के पूर्व यह अस्तित्व में था। इसी जगह पर द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण 649 ईस्वी में वैल्लभी के मैत्रिक राजाओं ने किया। पहली बार इस मंदिर को 725 ईस्वी में सिन्ध के मुस्लिम सूबेदार अल जुनैद ने तुड़वा दिया था। फिर प्रतिहार राज

माँ शारदा माता, मैहर वाली माता सतना जिला मध्य प्रदेश आप भी जाना चाहते है तो चलिए जानते संपूर्ण जानकारी

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  माँ शारदा माता, मैहर वाली माता   सतना जिला  मध्य प्रदेश आप भी जाना चाहते है तो चलिए  जानते संपूर्ण जानकारी पवित्र मा शारदा मंदिर मध्य प्रदेश के सतना जिले के ग्राम मैहर में स्थित है। यह स्थान सड़क और ट्रेन मार्ग से जुड़ा हुआ है। सतना जिला मुख्यालय से अनुमानित दूरी 40 किलोमीटर है मंदिर त्रिचूट पर्वत पर 600 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। तीर्थस्थल तक पहुंचने के लिए 1001 सीढ़ियों पर चढ़ना है। मंदिर का प्रबंधन माँ शारदा प्रबंधक समिति द्वारा किया जाता है। जिला कलेक्टर की अध्यक्षता वाली समिति ने देश भर से मंदिर में आने वाले तीर्थयात्रियों और भक्तों को बेहतर सुविधाएं प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया है। मंदिर का इतिहास: विन्ध्य पर्वत श्रेणियों के मध्य त्रिकूट पर्वत पर स्थित इस मंदिर के बारे मान्यता है कि मां शारदा की प्रथम पूजा आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा की गई थी। मैहर पर्वत का नाम प्राचीन धर्मग्रंथ 'महेन्द्र' में मिलता है। इसका उल्लेख भारत के अन्य पर्वतों के साथ पुराणों में भी आया है। मां शारदा की प्रतिमा के ठीक नीचे के न पढ़े जा सके शिलालेख भी कई पहेलियों को समेटे हुए हैं। सन्‌

2023 में द्वारकाधीश मंदिर आप भी जाना चाहते है तो तो जानें इससे जुड़ी रोचक बातें

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  2023 में द्वारकाधीश मंदिर आप भी जाना चाहते है तो  तो जानें इससे जुड़ी रोचक बातें द्वारकाधीश मंदिर इतिहासकारों का मानना है कि द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण भगवान श्री कृष्ण के पोते ने करवाया है. ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि ये मंदिर 2500 वर्ष पुराना है. ये द्वारका मंदिर आज समुद्र में समाहित है. और इस द्वारका नगरी में द्वारकाधीश मंदिर स्थित है. बता दें कि मंदिर में दो मुख्य प्रवेश द्वार हैं. मुख्य प्रवेश द्वार को मोक्ष द्वार और दूसरे को स्वर्ग द्वार कहा जाता है. मंदिर 5 मंजिला बना हुआ है. मंदिर का स्तंभ 78.3 मीटर ऊंची है. इस बात को बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि यहां मंदिर का ध्वज दिन में 5 बार बदला जाता है. जिसका निश्चित समय है. इतना ही नहीं, इसकी खास बात यह है कि इस ध्वज को भक्तों द्वारा ही स्पॉन्सर किया जाता है. यानी भक्त पहले ही बुकिंग करवा लेते हैं. 52 गज का होता है ध्वज बता दें कि द्वारकाधीश मंदिर का ध्वज 52 गज का होता है. इसके पीछे कई तरह के मिथक प्रचलित है. एक मिथक के अनुसार 12 राशि, 27 नक्षत्र, 10 दिशाएं, सूर्य, चंद्र, और श्री द्वारकाधीश मिलकर 52 हो जाते हैं. इसलिए ध्वज को 52

नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर का इतिहास एवम भगवान शिव के पशुपतिनाथ रूप की कहानी चलिए जानते है

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  नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर का इतिहास  एवम भगवान शिव के पशुपतिनाथ रूप की कहानी चलिए जानते है पशुपतिनाथ मंदिर कहाँ स्थित है? भारत के पड़ोसी देश नेपाल की राजधानी काठमांडू से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर बागमती नदी के किनारे भगवान शिव को समर्पित पशुपतिनाथ मंदिर ( Pashupatinath Temple Nepal ) अवस्थित है। देवपाटन गाँव में स्थित इस मंदिर की खासियत को देखते हुए ही इसे UNESCO ने विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया है। यह मंदिर नेपाल में भगवान शिव को समर्पित सबसे पवित्र मंदिरों में से एक गिना जाता है।  इतिहास : पशुपतिनाथ मंदिर का निर्माण कब हुआ? पशुपतिनाथ मंदिर ( Pashupatinath Mandir ) के इतिहास के बारे में कहा जाता है कि यह मंदिर वेदों के लिखे जाने से पूर्व ही यहाँ स्थापित हो गया था। जिस कारण इस मंदिर के बारे में कोई प्रमाणित तथ्य तो स्पष्ट तौर पर नहीं मिलते हैं। परन्तु कई जगह हमें इसके इतिहास से जुड़ी किंवदंतियां कहती है कि इस मंदिर का निर्माण सोमदेव राजवंश से संबंध रखने वाले पशुप्रेक्ष ने तीसरी इससे पूर्व में करवाया था। अभी इस मंदिर के ऐतिहासिक काल से जुड़े दस्तावेज 13वीं सदी के ही मिले हैं।