अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के बारे में संपूर्ण जानकारी कब और किसने बनवाया और इसका इतिहास।

 

अमृतसर के  स्वर्ण मंदिर के  बारे में संपूर्ण जानकारी कब और किसने बनवाया और  इसका इतिहास।



स्वर्ण मंदिर का इतिहास

स्वर्ण मंदिर की नींव शिक्षक गुरु श्री रामदास जी ने साल 1577 ईस्वी में रखी थी और सिखों के पांचवे गुरु श्री अर्जन देव ने 15 दिसंबर 1588 को हरिमंदिर साहिब का निर्माण शुरू करवाया।

स्वर्ण मंदिर को अफगान और मुगल आक्रांता ओं ने कई बार नुकसान पहुंचाने की कोशिश की लेकिन हिंदुओं और सिखों की अपार श्रद्धा होने के कारण इसे बार-बार बना दिया गया।



. स्वर्ण मंदिर किसने बनवाया – Who Built The Golden Temple In Hindi
अमृतसर का इतिहास करीब 400 साल पुराना है। यहां गुरूद्वारे की नींव  1577 में चौथे सिख गुरू रामदास ने 500 बीघा में रखी थी। अमृतसर का मतलब है अमृत का टैंक। पांचवे सिख गुरू गुरू अर्जन देव जी ने इस पवित्र सरोवर व टैंक के बीच में हरमंदिर साहिब यानि स्वर्ण मंदिर का निर्माण किया और यहां सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ की स्थापना की। श्री हरमंदिर साहिब परिसर अकाल तख्त का भी घर माना जाता है। एक और संस्करण में बताया गया है कि सम्राट अखबर ने गुरू रामदास की पत्नी को भूमि दान की थी,  फिर 1581 में गुरू अर्जुनदास ने इसका निर्माण शुरू कराया। निर्माण के दौरान ये सरोवर सूखा और खाली रखा गया था। हरमंदिर साहिब के पहले संस्करण को पूरा करने में पूरे 8 साल का समय लगा। ये मंदिर 1604 में पूरी तरह बनकर तैयार हुआ था। हालांकि कई बार स्वर्ण मंदिर को नष्ट किया गया, लेकिन 17वीं शताब्दी में महाराज सरदार जस्सा सिंह अहलुवालिया  द्वारा इसे फिर से बनवाया गया था। मार्बल से बने इस मंदिर की दीवारों पर सोने की पत्तियों से नक्काशी की गई है, जो देखने में बहुत ही सुंदर लगती हैं।

. कैसे पहुंचे स्वर्ण मंदिर – How To Reach Golden Temple In Hindi



अगर आप दिल्ली से अमृतसर ट्रेन या बाय रोड जा रहे हैं, तो लगभग 9 घंटे का समय लगेगा जबकि फ्लाइट से जाने में मात्र 1 घंटे का समय खर्च होगा। गोल्डन टैंपल के लिए जा रहे हैं तो यहां राजासांसी एयरपोर्ट है। अमृतसर से यहां आने में 15 मिनट का समय लगता है।

अगर आप दिल्ली से बाय रोड जा रहे हैं तो ग्रैंड ट्रंक रोड द्वारा अमृतसर पहुंच सकते हैं। इसके साथ ही आप हाईवे से जा रहे हैं तो करनाल, अंबाला, खन्ना, जलंधर और लुधियाना से होते हुए भी अमृतसर पहुंच सकते हैं। बता दें कि यहां से पाकिस्तान की दूरी केवल 25 किमी है।

स्वर्ण मंदिर वैसे तो संगमरमर से बना हुआ है लेकिन



 इसकी दीवारों पर सोने की पत्तियों से नक्काशी की हुई है।
सिख धर्म के लोग जब भी मंदिर में जाते हैं तो मंदिर में जाने से पहले अपना सिर झुकाते हैं जिसे मत्था टेकना कहते हैं। और फिर हाथ, पैर और मुंह धो कर मंदिर के अंदर जाते हैं।
स्वर्ण मंदिर में जैसे ही आप सीढ़ियों के सहारे अंदर जाते हैं तो उन पर स्वर्ण मंदिर में हुई घटनाएं और स्वर्ण मंदिर का इतिहास लिखा हुआ है।

स्वर्ण मंदिर के परिसर में देखने लायक चीजें
स्वर्ण मंदिर में आपको देखने के लिए अनेक चीजें मिलेंगी लेकिन आप नीचे दी गई चीजों को जरूर देखें।

अकाल तख़्त
सिखों के पांच तत्वों में से एक अकाल तख्त स्वर्ण मंदिर गुरुद्वारे में स्थित है जिसे सिख धर्म का सबसे बड़ा तख्त और पहला तख्त माना जाता है। अकाल तख्त की नींव नींव बाबा बुड्ढा, भाई गुरदास और गुरु हरगोबिन्द ने रखी थी।
हरमंदिर साहिब में स्थित अकाल तख्त पर सर्वप्रथम गुरु हरगोबिंद जी बैठे थे वर्तमान में ये शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समि‍ति‍ का कार्यालय है और सिखों के सभी निर्णय यहीं से लिए जाते है।

स्वर्ण मंदिर (Golden Temple)
हरमंदिर साहिब की चार द्वार

स्वर्ण मंदिर में चार प्रवेश द्वार है और चारों ही अपनी सिख स्थापत्य कला के लिए जाने जाते है साथ ही कहा जाता है की मंदिरों में जाति, धर्म के लोगो को नही जाने दिया जाता लेकिन हरिमंदिर साहिब में ऐसा नही है यहां किसी भी जाति, धर्म, लिंग, भाषा, और देश का नागरिक आ सकता है और दर्शन कर सकता है।


बेरी वृक्ष


बेरी वृक्ष को भी लोग देखने आते है इसके बारे में कहा जाता है की जब स्वर्ण मंदिर बनाया जा रहा था तब बाबा बुड्ढा इसी पेड़ के नीचे से काम पर नजर रखते थे जिसके कारण इसका नाम बेर बाबा बुड्ढा पद गया। वर्तमान में इसे भी तीर्थ स्थल माना जाता है।


स्वर्ण मंदिर या अकाल तख्त सरोवर


स्वर्ण मंदिर सरोवर के बीच में एक मानव निर्मित दी पर बना हुआ है इस सरोवर में मछलियां भरी हुई हैं और आसपास से जाने वाले श्रद्धालु और दूर से आने वाले श्रद्धालु सरोवर में डुबकी लगाते हैं।


दुखभंजनी बेरी और सरोवर के बारे में कहानी
स्वर्ण मंदिर गुरुद्वारे की दीवार पर लिखी किवदंतियों के अनुसार एक पिता ने अपनी बेटी का विवाह एक कोढ़ी व्यक्ति से कर दिया और वह लड़की उसके साथ रहने लगी एक दिन वह लड़की अपने पति को तालाब के किनारे बैठा कर गांव में भोजन की तलाश में निकल गई और तभी उसके पति ने एक कौए को सरोवर में डुबकी लगाते हुए देखा और वह डुबकी लगाते ही हंस बन गया। इसे देखने के बाद उस आदमी ने सोचा कि अगर मैं भी इस तालाब में डुबकी लगा हूं तो मेरा कोढ़ नष्ट हो सकता है और उसने तालाब में डुबकी लगा दी और उसका कोढ़ नष्ट हो गया। तब इसके पास बेरी के पेड़ थे और आज भी सरोवर के पास बीड़ी के पेड़ हैं।


स्वर्ण मंदिर के लिए काला दिन कौन सा माना जाता है?
3 से 6 जून 1984 को स्वर्ण मंदिर के इतिहास में एक काला पन्ना है इस दिन खालिस्तानी समर्थक आतंकी जनरैल सिंह भिंडरावाला अकाल तख्त में घुस गया और वहां से उन्हें निकालने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया जिसमे अकाल तख्त को काफी नुकसान पहुंचा और उस समय की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सिख विरोधी मान लिया गया।

स्वर्ण मंदिर का लंगर
गुरुद्वारों की सबसे खास बात होती है वहां के लंगर इसी तरह हरमंदिर साहिब यानी स्वर्ण मंदिर की 20 सबसे खास बात वहां का लंगर है।
यह लंगर साल के 365 दिन और 24 घंटे लगातार चलता रहता है यहां आने वाले श्रद्धालुओं और गरीबों के लिए यह हमेशा खुला रहता है।
दरबार साहिब यानी स्वर्ण मंदिर में लंगर में खाने-पीने की पूरी व्यवस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समि‍ति‍ के सेवादारों को सौंपी गई है। जो मंदिर में आने वाले चढ़ावे और अन्य कोषों से लेकर मंदिर में लंगर चलाते हैं।
एक अनुमान के मुताबिक हरमंदिर साहिब में रोज 40 से 50 हजार लोग लंगर में खाना खाते हैं। और उनके रुकने की व्यवस्था भी श्री गुरु रामदास सराय में की गई है।









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