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2023 में क्या आप भी मध्य प्रदेश में साँची के गुप्त काल के प्रसिद्ध मंदिर जान चाहते है तो चलिए हम आप को देते है वहा की संपूर्ण जानकारी

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  2023  में क्या आप भी  मध्य प्रदेश में साँची के  गुप्त काल के प्रसिद्ध मंदिर जान चाहते है तो चलिए हम आप को देते है वहा की संपूर्ण जानकारी साँची सांची सिर्फ 46 किलोमीटर भोपाल है। यह एक कस्बे से ज्यादा गाँव का है। सांची एक धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व का धार्मिक स्थल है। सांची कई स्तूपों का स्थल है,जो एक पहाड़ी चोटी पर बनाए गए थे। यह स्थान बौद्ध धर्म से संबंधित है लेकिन सीधे बुद्ध के जीवन से नहीं। यह अशोक से अधिक बुद्ध से संबंधित है। अशोक ने पहला स्तूप बनवाया और यहां कई स्तंभ बनवाए। प्रसिद्ध अशोक स्तंभों के मुकुट, जिनमें चार शेर पीछे की ओर खड़े हैं, को भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया है। सांची ने बौद्ध धर्म को अपनाया जिसने हिंदू धर्म की जगह ले ली। लेकिन समय ने इसकी मार झेली और धीरे-धीरे दोनों स्तूप और जगह भूल गए। 1818 में सांची को फिर से खोजा गया और यह पाया गया कि संरचना के अद्भुत टुकड़े अच्छे आकार में नहीं थे। धीरे-धीरे ऐतिहासिक और स्थान का धार्मिक महत्व पहचान लिया गया। स्तूपों का जीर्णोद्धार कार्य 1881 में शुरू हुआ और आखिरकार 1912 और 1919 के बीच इनकी सावधानीपूर्वक म

2023 में जाना चाहते है मदुरई मीनाक्षी-सुंदरेश्वर तो जानिए मंदिर दर्शन की संपूर्ण जानकारी

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   2023 में जाना चाहते है मदुरई मीनाक्षी-सुंदरेश्वर तो जानिए  मंदिर दर्शन की संपूर्ण जानकारी मिनाक्षी मंदिर एक ऐतिहासिक और प्राचीन हिंदू मंदिर है। यह मंदिर भारत के तमिलनाडु राज्य के मुदराई शहर की वैगई नदी के किनारे स्थित है। यह मंदिर 2500 साल पुराने शहर मुदराई का दिल है, साथ ही तमिलनाडु राज्य के आकर्षण केंद्रों में से एक है।   मिनाक्षी मंदिर के बारे में मिनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर, मिनाक्षी अम्मा मंदिर या मिनाक्षी मंदिर आदि नामों से जाना जाता है। यह मंदिर माता पार्वती को समर्पित है, जो मिनाक्षी के नाम से जानी जाती है और भगवान शिव जो सुन्दरेश्वर के नाम से जाने जाते है। ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना इंद्र ने की थी। जब वह अपने कुकर्मो के कारण तीर्थयात्रा पर गए थे, तब उन्होंने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। मुदराई का नाम मधुरा शब्द से पडा, जिसका अर्थ है मिठास। ऐसा कहा जाता है कि यह मिठास दिव्य अमृत से उत्पन्न हुई थी और भगवान शिव ने इस शहर पर अमृत की वर्ष की थी। मदुरई कैसे पहुँचे? मदुरई में एयरपोर्ट, ट्रेन और बस तीनो सुविधाएँ उपलब्ध है। वायुमार्ग से मदुरई कैसे पहुँचे? मदुरै

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के बारे में संपूर्ण जानकारी कब और किसने बनवाया और इसका इतिहास।

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  अमृतसर के  स्वर्ण मंदिर के  बारे में संपूर्ण जानकारी कब और किसने बनवाया और  इसका इतिहास। स्वर्ण मंदिर का इतिहास स्वर्ण मंदिर की नींव शिक्षक गुरु श्री रामदास जी ने साल 1577 ईस्वी में रखी थी और सिखों के पांचवे गुरु श्री अर्जन देव ने 15 दिसंबर 1588 को हरिमंदिर साहिब का निर्माण शुरू करवाया। स्वर्ण मंदिर को अफगान और मुगल आक्रांता ओं ने कई बार नुकसान पहुंचाने की कोशिश की लेकिन हिंदुओं और सिखों की अपार श्रद्धा होने के कारण इसे बार-बार बना दिया गया। . स्वर्ण मंदिर किसने बनवाया – Who Built The Golden Temple In Hindi अमृतसर का इतिहास करीब 400 साल पुराना है। यहां गुरूद्वारे की नींव  1577 में चौथे सिख गुरू रामदास ने 500 बीघा में रखी थी। अमृतसर का मतलब है अमृत का टैंक। पांचवे सिख गुरू गुरू अर्जन देव जी ने इस पवित्र सरोवर व टैंक के बीच में हरमंदिर साहिब यानि स्वर्ण मंदिर का निर्माण किया और यहां सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ की स्थापना की। श्री हरमंदिर साहिब परिसर अकाल तख्त का भी घर माना जाता है। एक और संस्करण में बताया गया है कि सम्राट अखबर ने गुरू रामदास की पत्नी को भूमि दान की थी,  फिर

भगवान जगन्नाथ की मूर्ति क्यों है अधूरी? चलिए जानते है जगरनाथ मंदिर की पूरी जानकारी।

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  भगवान जगन्नाथ की मूर्ति क्यों है अधूरी? चलिए जानते है जगरनाथ मंदिर की पूरी जानकारी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि राजा इंद्रद्युम्न पुरी में जगन्नाथ जी का मंदिर बनवा रहे थे। उन्होंने भगवान जगन्नाथ की मूर्ति बनाने का कार्य देव शिल्पी विश्वकर्मा को सौंपा। मूर्ति बनाने से पहले विश्वकर्मा जी ने राजा इंद्रद्युम्न के सामने शर्त रखी कि वे दरवाजा बंद करके मूर्ति बनाएंगे और जब तक मूर्तियां नहीं बन जातीं तब तक अंदर कोई प्रवेश नहीं करेगा। उन्होंने ये भी कहा कि यदि दरवाजा किसी भी कारण से पहले खुल गया तो वे मूर्ति बनाना छोड़ देंगे। राजा ने भगवान विश्वकर्मा की शर्त मान ली और बंद दरवाजे के अंदर मूर्ति निर्माण कार्य शुरू हो गया, लेकिन राजा इंद्रद्युम्न ये जानना चाहते थे कि मूर्ति का निर्माण हो रहा है या नहीं। ये जानने के लिए राजा प्रतिदिन दरवाजे के बाहर खड़े होकर मूर्ति बनने की आवाज सुनते थे। एक दिन राजा को अंदर से कोई आवाज सुनाई नहीं दी तो उनको लगा कि विश्वकर्मा काम छोड़कर चले गए हैं। इसके बाद राजा ने दरवाजा खोल दिया। इससे नाराज होकर बाद भगवान विश्वकर्मा वहां से अंतर्ध्यान हो गए और भगव

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी, उत्तर प्रदेश चलिए जानते है संपूर्ण जानकारी ।

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  श्री काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी, उत्तर प्रदेश चलिए जानते है संपूर्ण जानकारी । काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित सबसे प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक है। यह वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत में स्थित है। यह मंदिर  पवित्र नदी गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित है, और बारह ज्योतिर्लिंगस में से एक है, जो शिवमेटल के सबसे पवित्र हैं। मुख्य देवता विश्वनाथ या विश्वेश्वर नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ है ब्रह्मांड के शासक है। वाराणसी शहर को काशी भी कहा जाता है। इसलिए मंदिर को काशी विश्वनाथ मंदिर कहा जाता है। काशी विश्‍वनाथ मंदिर का इतिहास द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से काशी में है। यह स्थान शिव और पार्वती का आदि स्थान है इसीलिए आदिलिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है। ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उसका सम्राट विक्रमादित्य ने जीर्णोद्धार करवाया था। उसे ही 1194 में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था। इतिहासकारों के अनुसार इस

बद्रीनाथ मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है? और कैसे जाएं चलिए जानते है संपूर्ण जानकारी

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  बद्रीनाथ मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है? और  कैसे जाएं चलिए जानते है संपूर्ण जानकारी बद्रीनाथ मंदिर जिसे बद्रीनारायण मंदिर भी कहा जाता है, उत्तराखंड के बद्रीनाथ शहर में स्थित है, यह राज्य के चार धामों (चार महत्वपूर्ण तीर्थों) में से एक है। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ नामक चार तीर्थ-स्थल हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से चार धाम के नाम से जाना जाता है। कहां मौजूद है बद्रीनाथ उत्तराखंड के हिमालयी गढ़वाल क्षेत्र के बद्रीनाथ शहर में स्थित, मंदिर समुद्र तल से 10200 फीट की ऊंचाई पर है। मंदिर के ठीक सामने भव्य नीलकंठ चोटी है। मंदिर जोशीमठ से लगभग 45 किमी दूर है, जो कि एक बेस कैम्प भी है। कैसे पहुंचे बद्रीनाथ - हवाई मार्ग से: जॉली ग्रांट हवाई अड्डा बद्रीनाथ का निकटतम हवाई अड्डा है जो 314 किमी की दूरी पर स्थित है। जॉली ग्रांट हवाई अड्डा रोजाना उड़ानों के साथ दिल्ली से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है और बद्रीनाथ से इस हवाई अड्डे तक गाड़ी चलाने योग्य सड़कें भी अच्छे से जुड़ी हुई है। जॉली ग्रांट हवाई अड्डे से बद्रीनाथ के लिए टैक्सी उपलब्ध हैं। रेल द्वारा: बद्रीनाथ का निकटतम रेलवे स्

भगवान तिरुपति बालाजी के बाल हैं एकदम असली… चलिए जानते बाल जी की संपूर्ण जानकारी

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  भगवान तिरुपति बालाजी के बाल हैं एकदम असली… चलिए जानते बाल जी की संपूर्ण जानकारी तिरुपति बालाजी मंदिर को चमत्कारी मंदिर भी कहा जाता है। बता दें कि तिरुपति तिरुमला देवस्थानम भारत में सबसे अमीर और सबसे मशहूर मंदिरों में से एक है। आंध्र प्रदेश के चित्‍तूर जिले में स्थित इस मंदिर के प्रति दुनियाभर के लोगों की आस्‍था देखने को मिलती है। वेंकटेश्‍वर स्‍वामी इस मंदिर के प्रमुख देवता है , जिन्‍हें विष्णु भगवान का अवतार माना जाता है। तिरुपति बालाजी मंदिर को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं। तिरुपति में बाल दान करने के पीछे क्या है पूरी कहानी तिरुपति में बाल दान करने के पीछे क्या है पूरी कहानी      भक्‍त आंध्र प्रदेश स्थित तिरुपति बालाजी के मंदिर जाते हैं और देश के सबसे अमीर माने जाने वाले इस मंदिर में अपने बाल दान कर आते हैं। क्‍या आपको पता है कि इसके पीछे क्‍या मान्‍यता है ? इस परंपरा के पीछे यह पौराणिक मान्‍यता चली आ रही है कि इस दान के पीछे कारण यह है कि भगवान वेंकटेश्‍वर कुबेरजी से लिए गए अपने ऋण को चुकाते हैं। माना जा है कि यहां भक्‍त जितनी कीमत के बाल दान करते हैं भगवान उससे 10 गु

नैना देवी मंदिर देशभर में इतना खास,चलिए जानते है सम्पूर्ण जानकारी

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  नैना देवी मंदिर   देशभर में इतना खास,चलिए जानते है सम्पूर्ण जानकारी नैना देवी मंदिर    इस मंदिर को प्रसिद्ध शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है, आपको बता दें, यहां माता सती की आंखें गिरी थीं, जिस वजह से ये मंदिर नैना देवी मंदिर के नाम से मशहूर है। चलिए आप भी जानिए इस मंदिर की कुछ दिलचस्प बातें। माता नैना देवी का मंदिर(Naina Devi Mandir) हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में शिवालिक की पहाड़ियों के बीच स्तिथ है | हिन्दू धर्म में इस मंदिर को काफी भव्य और चमत्कारी माना जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि यहाँ से कोई भी खाली  हाथ नहीं लौटा | धर्म ग्रंथो के अनुसार जब महाराजा दक्ष ने हवन करा था तो माता सती बिना बुलाए अपने पिता के घर पहुँच गई , भगवान शिव को अपना आराध्य मानने के कारण महाराज दक्ष ने उनकी बहुत आलोचना की और अपमानित भी किया और माता सती  वही पर अग्नि को समर्पित हो गयी और भगवान् शिव उनकी शरीर को लेकर कई सालों तक भटकते रहे लेकिन भगवान् नारायण से यह देखा नहीं गया और उन्होंने अपने चक्र से माता सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए , और माता सती का जो भाग जहाँ पर गिरा वो शक्तिपीठ बन गया | नैना देवी

कोणार्क के सूर्य मंदिर के बारे में संपूर्ण जानकारी

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कोणार्क के सूर्य मंदिर के बारे में संपूर्ण जानकारी कोणार्क मंदिर सूर्यदेव को समर्पित है। यह दुनियाभर में प्रसिद्ध है। देश और दुनिया से बड़ी संख्या में श्रद्धालु सूर्यदेव के दर्शन और मंदिर अवलोकन हेतु कोणार्क आते हैं। साल 1984 में कोणार्क मंदिर को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल की मान्यता दी गई। कोणार्क मंदिर निर्माण को लेकर इतिहासकारों में असहमति है। कई जानकारों का कहना है कि कोणार्क मंदिर का निर्माण गंग वंश के शासक राजा नृसिंहदेव द्वारा करवाया गया है। वहीं, कुछ जानकर तर्क देते हैं कि राजा नृसिंहदेव की मृत्यु के बाद कोणार्क मंदिर का पूर्व निर्माण नहीं हो सका। वर्तमान समय में मंदिर का अधूरा ध्वस्त ढांचा का मुख्य कारण राजा नृसिंहदेव की मृत्यु को बताते हैं। हालांकि, इसमें सत्यता का अभाव है। जानकारों की मानें तो सन 1260 में कोणार्क मंदिर का निर्माण हो चुका था। जबकि, राजा नृसिंहदेव का शासन काल 1282 तक रहा था। आइए, इस मंदिर के बारे में सबकुछ जानते हैं- मंदिर स्थापना की कथा किदवंती है कि भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब शापित थे। उन्हें कोढ़ रोग था। कालांतर में साम्ब ने मित्रवन में चंद्रभागा नद

हिंगलाज माता का शक्तिपीठ पाकिस्तान में स्थित है

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  हिंगलाज माता का शक्तिपीठ पाकिस्तान में स्थित है हिंगलाज ही वह जगह है, जहां माता का सिर गिरा था। बृहन्नील तंत्रानुसार यहां सती का 'ब्रह्मरंध्र' गिरा था। पाकिस्तान द्वारा जबरन कब्जाए गए बलूचिस्तान में हिंगोल नदी के समीप हिंगलाज क्षेत्र में सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है माता हिंगलाज का मंदिर जो 51 शक्तिपीठों में से एक है।  पाकिस्तान में स्थित माता हिंगलाज का मंदिर प्रधान 51 शक्तिपीठों में से एक है।  यहां माता सती कोटटरी रूप में जबकि भगवान शंकर भीमलोचन भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। इस मंदिर की माता को संपूर्ण पाकिस्तान में नानी मां का मंदिर भी कहा जाता है। मुसलमान हिंगुला देवी को 'नानी' तथा वहां की यात्रा को 'नानी का हज' कहते हैं। पूरे बलूचिस्तान के मुसलमान भी इनकी उपासना एवं पूजा करते हैं। वे मुस्लिम स्त्रियां जो इस स्थान का दर्शन कर लेती हैं उन्हें हाजियानी कहते हैं। उन्हें हर धार्मिक स्थान पर सम्मान के साथ देखा जाता है। मुसलमानों के लिए यह नानी पीर का स्थान है। यहां का मंदिर गुफा मंदिर है। ऊंची पहाड़ी पर बनी एक गुफा में माता का विग्रह रूप विराजमान है। पह

कोलकाता का दक्षिणेश्वर काली मंदिर है बेहद खास, दर्शनमात्र से पूरी हो जाती है सभी की मनोकामना ।

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  कोलकाता का दक्षिणेश्वर काली मंदिर है बेहद खास, दर्शनमात्र से पूरी हो जाती है सभी की  मनोकामना । कोलकाता का दक्षिणेश्वर काली मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है. यहां आने वाले श्रद्धालुओं पर मां की असीम कृपा बनी रहती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार जब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े किए थे तो उनके दाएं पैर की कुछ उंगलियां इसी जगह पर गिरी थी. काली मां की अराधना करने वाले भक्तों के लिए कोलकाता का दक्षिणेश्वर मंदिर दुनिया के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है. मंदिर में मां काली के अवतार मां भवतारिणी की पूजा की जाती है. 25 एकड़ में फैले इस मंदिर में हर रोज देश भर से हजारों श्रद्धालु आते हैं. यह मंदिर दक्षिणेश्वर में स्थित है और इसलिए इसे दक्षिणेश्वर काली मंदिर के नाम से जाना जाता है. दक्षिणेश्वर काली मंदिर क्यों प्रसिद्ध है? यहां आने वाले श्रद्धालुओं पर मां की असीम कृपा बनी रहती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार जब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े किए थे तो उनके दाएं पैर की कुछ उंगलियां इसी जगह पर गिरी थी. काली मां की अराधना करने वाले भक्तों के लि

Kamakhya Devi:आज भी देवी की प्रतिमा होती है रजस्वला चलिए जानते है संपूर्ण जानकारी

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  Kamakhya Devi: आज भी देवी की प्रतिमा होती है रजस्वला चलिए जानते है संपूर्ण जानकारी Kamakhya Devi Mandir:  भारत भूमि पर आज भी ऐसे हज़ारों मंदिर मौजूद हैं, जहां चमत्कार होते हैं, जो भक्तों के विश्वास और आस्था को और भी दृढ करने में सहायक होते हैं. आपने भी कई चमत्कारों के बारे में पढ़ा या सुना होगा परंतु कभी आपने सुना है कि किसी मंदिर में देवी प्रतिमा रजस्वला होती है? अगर नहीं तो आइए आज हम बताते हैं आपको एक ऐसे ही मंदिर के बारे में, जहां देवी के रजस्वला होने के सबूत प्राप्त होते हैं, यह जगह है कामाख्या देवी मंदिर, गुवाहाटी. असम के नीलांचल पर्वत पर स्थित कामाख्या देवी मंदिर, देवी के 52 शक्ति पीठों में से एक है और यह शक्ति पीठ तांत्रिक साधनाओं के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. आइए जानते हैं इस मंदिर की कथा. मंदिर की स्थापनापौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवी सती ने यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी थी, तब भगवान शिव ने माता सती का जला हुआ शरीर लेकर पूरे संसार में भ्रमण किया, जिसके कारण उनका क्रोध बढ़ता ही जा रहा था. तब स्थिति को संभालने के लिए श्रीहरि ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के पार्थिव